ये मास्क गले का कांटा नहीं आपके लिए संजीवनी है, सरकारी आंकड़े झूठे मुर्दे सच बोल रहे हैं : गरिमा श्रीवास्तव (Garima Srivastav) "द लोकनीति" सब एडिटर

ये मास्क गले का कांटा नहीं आपके लिए संजीवनी है, सरकारी आंकड़े झूठे मुर्दे सच बोल रहे हैं : गरिमा श्रीवास्तव (Garima Srivastav) "द लोकनीति" सब एडिटर 


कोरोनावायरस रुपी दानव जब से देश में आया है लोगों को यकीनन ऐसा लगने लगा होगा कि वाक़ई कल का कोई ठिकाना नहीं है. कोरोना से ज्यादा खतरनाक सरकार है. आंकड़ों पर लीपापोती का कार्यक्रम लगातार जारी है . आंकड़े उनके लिए बिल्कुल भी उपयोगी नहीं है . आप की मौत आपकी सुरक्षा से उन्हें बिल्कुल फर्क नहीं पड़ता. अगर किसी को फर्क पड़ेगा तो वह आप खुद हैं. आपको और आपके परिजनों को ही आपकी मौत से फर्क पड़ सकता है.


कोरोना से सुरक्षा के लिए मास्क अत्यंत उपयोगी है.

लोगों ने मास्क को गले का कांटा समझ लिया है, अगर ग्रामीण क्षेत्र की तरफ देखें तो लोग बिल्कुल भी मास्क पहनना पसंद नहीं कर रहे हैं. हालांकि हर घर की स्थिति यही नहीं है पर ज्यादातर की अगर बात करें तो मास्क से लोग कन्नी काटने की कोशिश करते रहे हैं.
पर यह मास्क आपके गले में फंसा हुआ कांटा नहीं है, यकीन मानिए यह संजीवनी है.
अगर हमें कोरोना से बचना है तो हमें उचित तरीके से मास्क का हर हाल में इस्तेमाल करना होगा.
सरकार ने अपने आंखों पर मास्क चढ़ा रखा है, इस संकट की घड़ी में हमें खुद ही बचना होगा. वरना एक छोटी सी लापरवाही बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकती है.


मास्क को कूड़े कचरे के साथ नहीं बल्कि अलग रखें :- 

कोरोना से बचने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को मास्क पहनने का पाठ तो लंबे समय से पढ़ाया जा रहा है लेकिन इस्तेमाल के बाद इसका निस्तारण कैसे करें इस बाबत न तो लोगों को जागरूक किया गया है न ही लोग इस बारे जागरूक है। ज्यादातर की बात करें तो  लोग पहने हुए मास्क, ग्लब्स कूड़े में ही फेंक दे रहे हैं यहीं कूड़ा घरों से नगर निगम कर्मी टिप्परों में उठाकर ले जाते हैं। सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों में तो मेडिकल वेस्ट अलग कंपनियों द्वारा उठाया जाता है लेकिन घरों में से यह मास्क,ग्लब्स समेत अन्य मेडिकल वेस्ट कूड़े के साथ ही फेंकी जाती हैं वह सब नगर निगम कर्मी उठा कर ले जाते हैं जो डंप में फेंकते है व वहां से पूरा कूड़ा मेन कूड़ा डंप में फेंका जाता है।

पर हमें ऐसा बिल्कुल नहीं करना है. हर कचड़ा गाड़ी अलग से मास्क इत्यादि चीजों के लिए एक अलग बैग लेकर आती है जिसमें आप इस्तेमाल किए हुए मांस और ब्लॉग्स को किसी कैरी बैग में रखकर डाल सकते हैं. छोटी छोटी सावधानी हमें आने वाली बड़ी मुश्किल से बचा सकती है.
नगर निगम की गाड़ी इस कचड़े को ले जाकर अलग से जलाती है.


सरकार नहीं आपको खुद रखना है अपना ध्यान :-

इस संकट की घड़ी में अगर आप सरकार से उम्मीद करते हैं कि तो आप भटक चुके हैं हम सबको अपना ध्यान अपने परिजनों का ध्यान खुद रखना है. देश में मौत का खेल चल रहा है. यह सरकार आपकी तरफ ताकने वाली भी नहीं है.

सरकारी आंकड़े झूठ मुर्दे सच बोल रहे:-

देश में इस वक्त वही हाल है "अपनी डफली अपना राग नाच मंगरुआ घाटे घाट " यानी समय देखकर सरकार खुद की नियम बना रही है और फिर उन्हें जरूरत के अनुसार  बदल देती है. जिस वक्त इस महामारी में कोरोना के लड़ना चाहिए उस वक्त यह दिग्गज सोशल मीडिया हैंडल से लड़ रहे हैं. अब क्या करेंगे साहब बस ऐसी स्थिति में रहना है. मैं तो कहूंगी कि सत्ता का मोह ही ऐसा है. जो भी इस कुर्सी पर बैठा उसे मनमर्जी करनी ही है. कोरोना से जितने आंकड़े दिखाए जा रहे हैं उसकी कई गुना मौतें हुई हैं. पवित्र गंगा ने भी इस भयावहता का उदाहरण दे दिया. पर हां उम्मीद जरूर है कि एक दिन यह भयावहता खत्म होगी.

पीएम केयर्स के वेंटिलेटर को लेकर देश को अंधेरे में रखना ज्यादा खतरनाक :

देश संकट में है. और आपदा में अवसर ढूंढने का प्रयास लगातार जारी है.

पीएम केयर्स के तहत कई कंपनियों को वेंटिलेटर की सप्लाई का ठेका मिला है। इसकी गुणवत्ता को लेकर पिछले ही साल हफिंगटन पोस्ट में समर्थ बंसल और अमन सेठी ने विस्तार से छापा था कि कैसे मुंबई के अस्पताल ने वेंटिलेटर लगाने से मना कर दिया। उस मामले में क्या कार्रवाई हुई सार्वजनिक रुप से नहीं पता। इसके बाद लगातार ख़बरें छपी हैं कि यह वेंटिलेटर ख़राब है। इसके इस्तमाल में न होने के कारणों में और भी बहुत हैं। जैसे चलाने के लिए स्टाफ़ नहीं है। उसका कोई बजट नहीं दिया गया। कंपनी ने ट्रायल नहीं कराया। ट्रेनिंग नहीं दी। लेकिन अगर वेंटिलेटर ही ख़राब क्वालिटी का है तो इसे अहं का सवाल नहीं बनाया जाना चाहिए। लोगों की ज़िंदगी का सवाल है। मशीन को लेकर लेकर जाँच तो हो ही और पीएम केयर्स के मशीनों में जिन मरीज़ों को रखा गया उनका भी रिसर्च हो। जाँच के नाम पर लीपापोती न हो। 
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के एक पोस्ट के माध्यम से संबंधित जानकारी प्राप्त हुई है.

आखिर में यही कहूंगी कि आप सभी इस लीपापोती में ना फंसे. खुद पर भरोसा रखें खुद का ध्यान रखें. किसी के भी बहकावे में ना आए चाहे वह  कोई भी हो कोई भी मतलब "कोई भी".....

उम्मीद है कि संकट जल्द ही खत्म होगा..अब उम्मीद पर ही दुनिया कायम है...... हम कोई अलग से नहीं.....

 गरिमा श्रीवास्तव 
(Garima Srivastav)
 सब एडिटर
 द लोकनीति मीडिया.


बताते चलें की गरिमा श्रीवास्तव लगातार इस संकट में लोगों की मदद कर रही है, चाहे वह सोशल मीडिया के माध्यम से हो, या अपने सामर्थ्य अनुसार लोगों को जरूरी सामान उपलब्ध कराने तक....

हम आशा करते हैं कि इस संकट की घड़ी में वह सभी लोग जो सोशल मीडिया पर पॉपुलर है जिनकी बातें ऊपर तक सुनी जाती है वह ज्यादा से ज्यादा लोगों की मदद करें. जनकल्याण में तत्पर रहें....