हिंदूवादी नेताओं से मुजफ्फरनगर दंगों के मुकदमें वापसी को अदालत की सहमति

 

स्टाफ़ रिपोर्टर। Twocircles.net 

स्थानीय अदालत ने शुक्रवार को साल 2013 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए मुजफ्फरनगर दंगे के मामलों में यूपी सरकार में मंत्री सुरेश राणा और विधायक संगीत सोम सहित 40 लोगों के खिलाफ दर्ज मुकदमे को वापस लेने में सहमति दे दी है। मुकदमे में बीजेपी नेताओं पर भड़काऊ भाषण देने का आरोप था। इनमे बीजेपी नेता भारतेंदु सिंह और साध्वी प्राची भी शामिल हैं।

इनके ऊपर आरोप था की इन्होंने 7 सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर के नंगला मंडौड़ के इंटर कॉलेज में हुए जाट महापंचायत में खास धर्म के लोगों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए थे। जिसकी वजह से दंगा भड़का। इनके खिलाफ ये मुकदमा सिखेड़ा पुलिस थाने में अपराध संख्या 178/2013 में एसएचओ चरण यादव द्वारा दर्ज किया गया था। 

दंगे के एक साल बाद 2014 के लोकसभा के चुनाव में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी सफलता मिली थी। इसकी वजह कइयों ने खास धर्म के मतों के ध्रुवीकरण को बताया था। जिस वजह से उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय लोक दल का सफाया हो गया था। उसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनी। जिसमे उस समय के आरोपित बीजेपी नेता सुरेश राणा विधायक बने और गन्ना मंत्री का भी पद मिला था। साथ ही संगीत सोम भी विधायक के लिए चुने गए थें और बीजेपी के ही नेता संजीव बालियान सांसद बन गए थें जिसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने मुकदमे को वापस लिए जाने की मांग रखी थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 27 अगस्त 2013 को इस सारे मामले की शुरुआत हुई थी जब  शाहनवाज नाम के एक व्यक्ति झगड़ा सचिन और गौरव से हुआ था । जिसमे शाहनवाज को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। बाद भीड़ ने शाहनवाज की मौत का बदला लेते हुए मलिकपुरा के रहने वाले ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की कवाल गांव में पीट-पीट कर हत्या कर दी थी। इस मामले ने चिंगारी का काम किया जिसके बाद दंगा भड़क उठा था। सोशल मीडिया में आने वाले वीडियो और बयानों ने भी उस आग में घी जैसा ही काम किया था।

जिसके बाद पूरा इलाका दंगे की भेंट चढ़ गया और 65 लोगों ने अपनी जाने गंवा दी थी। दंगे की वजह से 40 हजार से अधिक लोगों को अपना घर बार छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।

इस दौरान 6800 से ज्यादा लोगों पर 510 मुकदमे दर्ज किए गए थें। ये मुकदमे दोनो पक्षों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ दायर हुए थें, जिनमे से कुछ पुलिस की ओर से भी दर्ज किए गए थें। घटना के संबंधित 1480 लोगों की गिरफ्तारी हुई और 175 केसों में पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल की गई थी। 

पिछले साल 2020 में उत्तर प्रदेश सरकार ने बीजेपी नेताओं के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस लेने की सिफारिश की थी। कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 321 के तहत मुकदमा वापस लेने की याचिका कोर्ट में दायर किया गया था। अब सरकारी वकील राजीव शर्मा ने बताया है कि विशेष कोर्ट संख्या 5 (एमपी-एमएलए) के न्यायधीश राम सुध सिंह ने याचिका को स्वीकार करते हुए केस वापस लेने की सहमति दे दी है। 

एक अन्य मामले में स्थानीय अदालत ने मुजफ्फरनगर जिले के सांप्रदायिक दंगों के दौरान धार्मिक शत्रुता को बढ़ावा देने और अन्य अपराधों के आरोपित 6 लोगों को भी अपर्याप्त सबूतों के चलते बरी कर दिया है। सारे आरोपियों  को विशेष जांच दल (एसआईटी) ने आईपीसी की धारा 153ए (धर्म और जाति के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 147 (दंगा), 392 (डकैती), और 436 के तहत मुकदमा दायर करवाया था।

बचाव पक्ष के वकील चंद्र वीर सिंह ने कहा कि आरोपी उमेश, देवेंद्र, पिंटू, लालुत कुमार, विनोद और अरविंद को अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश निशांत देव ने सबूतों के अभाव में बरी किया है।

एसआईटी ने दंगा पीड़ित कासीमुद्दीन की शिकायत के आधार पर अदालत में आरोप पत्र दायर किया था। कासिम का आरोप था कि दंगाइयों ने 8 सितंबर, 2013 को जिला के शामली कोतवाली के तहत आने वाले सिम्बलका गाँव में उनके घर में घुसकर कीमती सामानों को लुटा था और फिर घर में आग लगा दी थी।