दिल्ली के बॉर्डर को मजबूती से सील करने की तैयारी को देखकर लग रहा है कि सरकार समाधान निकालने के मूड में नहीं है ~ महेन्द्र कुड़िया

दिल्ली के बॉर्डर को मजबूती से सील करने की तैयारी को देखकर लग रहा है कि सरकार समाधान निकालने के मूड में नहीं है और यह संघर्ष धीरे-धीरे क्रांति के रास्ते धकेला जा रहा है!वैसे भी पहले दिन से ही क्रमवार देखा जाएं तो   किसी भी दिन ऐसा नहीं लगा कि सरकार समाधान निकालने को लेकर संजीदा है।


एक तरफ मंत्रियों की टीम किसानों के साथ वार्ता कर रही थी तो दूसरी तरफ बाकी केंद्रीय मंत्रियों,बीजेपी के सांसदों ,मुख्यमंत्री,विधायकों सहित पार्टी की आईटी सेल व संघी टोला किसानों को खालिस्तानी,आतंकी,गद्दार व देशद्रोही आदि कहे जा रहे थे।मतलब साफ था कि आंदोलन लंबा खींचकर थका दिया जाए और कमजोर पड़ने पर दमन करके निकाल दिया जाएं!

जिस तरह किसान नेता आरोप लगा रहे है व फोटो/वीडियो सामने आ रहे है उससे जाहिर हो रहा है कि सत्ताधारी पार्टी के नेता सहयोगी संगठनों को लेकर किसानों को हिंसा के लिए उकसा रहे है।लोकतंत्र में जब विपक्ष कमजोर होता है व सत्ता जन-आंदोलन का बिना समाधान निकाले हिंसा के जरिये दमन करना चाहे तो विकल्प क्रांति के रूप में ही सामने आता है।

आज ट्विटर को कानून का हवाला देकर उन सभी स्वतंत्र लोगों के अकाउंट बंद करवा दिए है जिनके 5हजार से ज्यादा फॉलोवर थे,सरकारी नीतियों की आलोचना कर रहे थे,अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा रहे थे व किसानों की मांगों का समर्थन कर रहे थे।जिस प्रकार यह कार्यवाही की गई उसके हिसाब से लग रहा है कि आज या कल में यही कार्यवाही करने के लिए फेसबुक को कहा जायेगा!

दिल्ली के बॉर्डर पर इंटरनेट सेवा बंद करने के बाद पूरे हरियाणा में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई ताकि लोगों का संपर्क कट जाएं और दिल्ली कूच न कर सके।हुआ इसका बिल्कुल उल्टा।जो लोग घर से ही आंदोलन पर नजर रख रहे थे वो नेट बंद होते ही दिल्ली बॉर्डर की तरफ निकल पड़े।सोशल मीडिया में जो नई जमात तैयार हुई थी उसकी जगह खापें उठ खड़ी हुई।उत्तर भारत की किसान कौमों में खाप एक अद्भुत व्यवस्था है जिसके ऐलान का पालन हर छोटे-बड़े को जी-जान से करना ही होता है।देखते ही देखते लाखों बुजुर्ग,युवा,महिलाएं व बच्चे निकल पड़े।

इस आंदोलन को शुरू से ही कमतर आंककर जिस तरह डील किया जा रहा है उससे साफ जाहिर हो रहा है कि सत्ता में बैठे लोगों को देश की सामाजिक व्यवस्था, एकजुट होने की तत्परता,मजबूती की कोई जानकारी नहीं है।भारतीय इतिहास की सच्चाई को बदलने के लिए जो साहित्य रच रहे थे उसी में रम गए है,उसी को ही बुनियाद समझने की भूल कर बैठे है।

1789 से लेकर 1799 तक फ्रांसीसी क्रांति चली थी।1830 में दुबारा क्रांति हुई थी।1775 से 1783 तक पूरे आठ साल अमेरिकी क्रांति चली और अमेरिका आजाद हुआ था।1791 में हैती की क्रांति हुई थी और फ्रांस से आजाद हो गया था।बीसवीं सदी की शुरुआत से ही विभिन्न देशों में क्रांतियां हुई थी।1917 में रूस की बोल्शेविक क्रांति शुरू हुई और जारशाही के अहंकार को चकनाचूर करके सत्ता से उखाड़ फेंका गया था।1908 में ऑटोमन साम्राज्य में युवा तुर्क क्रांति हुई और तुर्की में लोकतंत्र की स्थापना हुई।सबसे लंबी क्रांति पड़ौसी देश चीन में मंचू वंश के खिलाफ हुई जो 1911 से 1949 तक चली जिसमे 15 लाख तथाकथित राष्ट्रवादी व 2 लाख क्रांतिकारी मारे गए थे।

1952 में छोटे से द्वीपीय देश क्यूबा में क्रांति शुरू हुई और अमेरिका जैसे ताकतवर देश के बोरिया बिस्तर समेट दिए थे।ये सारी क्रांतियां गैर-इंटरनेट व गैर-सोशल मीडिया के जमाने मे हुई थी और सभी सफल हुई थी।आवागमन व संचार माध्यमों का पूर्णतया अभाव था।जो कुछ भी संसाधन थे वो सब सत्ता के पास थे।तानाशाही, निरंकुश सत्ता ने अन्याय व अत्याचार की पराकाष्ठा लांघी थी लेकिन जनता के हौंसले व लड़ने के जज्बे के आगे सब ध्वस्त होते गए।

क्या हाईवे खोदना,बड़े-बड़े पत्थरों के बेरिकेड लगाना,कंटीले तार बांधना, सड़कों पर बड़ी-बड़ी कीलें फिट करना,इंटरनेट बंद करना,सोशल मीडिया अकाउंट बंद करवाना आदि क्रियाकलाप किसानों के लड़ने के हौंसले को कमजोर कर पाएंगे?इस देश मे भले ही क्रांति न हुई हो,भले ही आजादी का आंदोलन टुकड़ों में हुआ हो लेकिन अंग्रेजों को भी पता था कि किसानों से ज्यादा पंगा नहीं लेना चाहिए जबकि उस समय खेती ही आय का प्रमुख जरिया था।1907 में भगतसिंह के चाचा अजीतसिंह के नेतृत्व में 9 महीने किसान आंदोलन चला था और आखिर अंग्रेजों ने बुद्धिमता दिखाते हुए कानून वापिस ले लिए थे।

जलियांवाला बाग कांड के बाद जिस तरह क्रांतिकारी खड़े हुए उसके बाद धीरे-धीरे अंग्रेजों के समझ मे आ गया कि अब डेरे लदने के दिन आ गए है इसलिए बड़े स्तर के सुधारों के साथ सत्ता हस्तांतरण की तरफ बढ़ने लगे थे।भगतसिंह कहा करते थे कि बिना क्रांति,व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के गोरे अंग्रेज चले जायेंगे और काले अंग्रेज कुर्सियों पर कब्जा कर लेंगे।अंततः हुआ भी वही।व्यवस्था परिवर्तन न होने की मार देश 73 साल से भुगत रहा है।

डराने-धमकाने की,अहंकार के पोषण की,एक तरह की विचारधारा थोपने की,अपना एजेंडा लागू करने की हठधर्मिता इस किसान आंदोलन को जन-आंदोलन में परिवर्तित कर चुकी है।अब जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ेगा उसमे तीन कृषि कानूनों व एमएसपी गारंटी के कानून की मांग पीछे छूटती जाएगी और मांग कुर्सी वापसी की तरफ बढ़ती जाएगी।जनता के सामने निरंकुश राजतंत्र की तानाशाही नहीं चल सकी तो चुनी हुई लोकतांत्रिक सत्ता की कैसे चल पाएगी!सत्ता-व्यवस्था की असल ताकत जनता होती है।

प्रेमसिंह सियाग की वॉल से