बलदेव राम मिर्धा जयंती विशेष, कौन थे मिर्धा? ~ महेन्द्र कुड़िया

 बलदेव राम मिर्धा जयंती विशेष, कौन थे मिर्धा? ~ महेन्द्र कुड़िया

Baldev Ram Mirdha Biography


ऊंच-नीच तथा छुआछूत के घोर विरोधी बलदेव राम मिर्धा एक ऐसी शख्सियत है, जिन्होंने अत्यधिक अमानवीय जाति आधारित भेदभाव व छुआछूत वाले मारवाड़ क्षेत्र में समानता व स्वतंत्रता की अलख जगाई थी। मिर्धा स्वयं जागीरदार थे फिर भी इन्होंने मारवाड़ की जनता को सामंत शाही के अत्याचार और जुल्मों सितम से डटकर मुकाबला करने की प्रेरणा देकर जागीरदारी प्रथा को समाप्त करवाते हुए किसानों को खातेदारी अधिकार दिलवाने का ऐतिहासिक कार्य किया।


             मारवाड़ में शेक्षिक,सामाजिक व राजनीतिक *जन जागरण एवं छुआछूत उन्मूलन* के क्रम में बलदेवरामजी मिर्धा के कृतीत्व पर एक नजर...


           बलदेव राम मिर्धा रियासत काल में जोधपुर रियासत के पुलिस अधिकारी थे. अपने पुलिस सेवा काल में, बलदेव राम जी, विशेष रूप से मारवाड़ में डाकुओं(ऐसे लूटेरे, जिन्हें स्थानीय सामंतों की शह थी)के उन्मूलन लिए जाने जाते थे । यही कारण था कि, मारवाड़ के सेठ साहूकार, बलदेव राम जी के कहने पर, किसान छात्रावास निर्माण व ग्रामीण छात्रों की शिक्षा के अभियान में आर्थिक सहयोग करते थे.


                 जन जागरण अभियान के तहत,मिर्धा जी उन दिनों मारवाड़ के गांवों के दौरे करते थे। मिर्धा जी के इस अभियान से सामंत लोग बेहद खफा थे। उन दिनों मारवाड़ की जनता में सामंतों का खौप इस कदर था कि आमजन बलदेव रामजी की सभाओं में आने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाते थे. *सभा में भाग लेने वालों को जागीरदार तलब किया करते थे और पूछते थे कि,क्या यह सच है कि आज तुमने डीआईजी साहब का भाषण सुना था*...? जिस पर सामान्यतः सभी को ऐसा ही कोई बहाना करना था कि, मुझे उनकी सभा का कोई ध्यान ही नहीं था,मैं तो दूसरी तरफ मुहँ किए बैठा पैर में धंसा एक कांटा निकाल रहा था। *सभा के दरमियान मिर्धा जी के लिए पानी लाने वालों तक को भी दंडित किया जाता था।*


           अर्थात आपकी मीटींग में दरी तो दूर पानी की चरी लाने वाले की भी बाद में शामत आ जाती थी, इसलिए मिर्धाजी पानी भी साथ में लेकर चलते थे.


           भाषण सुनने वाले किसानों को गाँव के कोर्ट(गढ़/रावले) में बुलाकर सामन्त पूछते कि "आप तो डी.आई.साहब का लेक्चर हुणिया हा..." किसान यह कह कर पिण्ड छुडा़ते कि "नहीं बापजी म्हैं तो अपूटो बैठो ओ..."


          गांवों की इन जन जागरण यात्राओं के दौरान मिर्धा जी शिक्षित करने के लिए, *लोगों से उनके लड़के मांगकर ले जाते थे और उन्हें जोधपुर ले जाकर अपने संरक्षण में पढ़ाते थे*


              राजनीतिक जनजागरण के लिए सन 1943 में बलदेव रामजी मिर्धा ने जोधपुर मे़,रहबरे आज़म दीनबंधु सर छोटूराम जी की जनसभा करवाई थी.इस सभा में सर छोटूराम,जोधपुर महाराजा व बलदेव राम मिर्धा को एक समान आसन पर बैठा देखकर मारवाड़ की जनता का गला रूंध आया था कि,अगर काबिलियत हो तो किसान का बेटा भी महाराजा के बराबर हो सकता है।


            मेरे दादा कहा करते थे कि,शोषितों के लिए आन्दोलनरत बलदेवरामजी मिर्धा सभाओं में छुआछूत और ऊंच-नीच के विरुद्ध ग्रामीण किसानों से यह आह्वान करते थे कि, *मरे हुए पशु को हाथ लगाने से कोई मेगवाल या चमार नहीं होता* । *तुम मुझे कोई मरा हुआ जानवर बताओ,मैं उसे ढोकर बताता हूं*


            दादाजी कहते थे कि,उन दिनों मरे हुए जानवर के हाथ लगाने को निम्नतम माना जाता था,अतः गांव में मरा हुआ जानवर होते हुए भी लोग इस डर से बलदेवरामजी को नहीं बताते थे कि, मरे हुए जानवर को छूना नीच कर्म है तथा, बताने पर डी.आई.जी.साहब ऐसा कर देगें,जिसे ऊंच-नीच की मानसिकता के उस जमाने के ग्रामीण किसी अनर्थ से कम नहीं समझते थे।


            इसी संबंध में अभी हाल ही में हुई एक चर्चा में शिणोद गांव के बुजुर्ग जीवण रामजी जाजड़ा ने मुझे बताया कि,बलदेवराम जी ने कई काम ठीक किए थे। परंतु उनमें भी एक कमी थी। हमारे गांव के गवाड़ की एक मीटिंग में बलदेव राम जी ने मेगवालों को कहा था कि, गवाड़ में भी आप एक कौने में क्यों खड़े हैं...? किसी भी सार्वजनिक स्थान पर आपका बराबर का अधिकार है। मेरी उपस्थिति में आप गांव के मंदिर में प्रवेश करें,आपको अभी यहां कोई रोकने वाला नहीं है।


मुझे यह बात कुछ ज्यादा ही प्रगतिशील लग रही थी इसलिए मैंने उनसे पूछा कि आपके गांव में मेघवालों की बड़ी आबादी है इन के तीन मोहल्ले हैं। क्या डीआईजी साहब के कहने पर उस दिन ये लोग मंदिर में प्रवेश कर गए...?


उन्होंने कहा कि, बलदेव राम जी के कहने के बावजूद भी उनकी इसलिए इतनी हिम्मत नहीं हो सकी। क्योंकि उन्हैं गांव के लोगों ने उसी समय इशारों इशारों में कह दिया था कि यह तो अभी चले जाएंगे।आपको गांव में रहना है...?


जीवण रामजी से कहा कि, जाट तो बलदेव रामजी को उस जमाने में बहुत मानते थे फिर भी ऐसा क्यों...?


           उन्होंने कहा मानने का मतलब हर बात थोड़ी मानी जाती थी बलदेव राम जी ने तो मृत्यु भोज का भी बहुत अधिक विरोध किया था। परंतु इतना बड़ा कद होते हुए भी उनकी इस बात को लोगों ने कभी नहीं माना था।


            आगे चलकर मिर्धाजी ने मारवाड़ के ग्रामीण बच्चों को शिक्षित करने के लिए किसान छात्रावासों की स्थापना की,जिनमें सभी जाति के ग्रामीण बच्चों को एक ही भवन में रखवाया.


       *मारवाड़ में छुआछूत उन्मुलन में यह पहला सामुहिक प्रयास था.इन छात्रावासों में ग्रामीण ब्राह्मणों,राजपूतों, समस्त पिछड़ी जातियों, मेगवालों,नायकों आदि के छात्रों के काफी अच्छी तादाद में एक साथ  रहने की पुख्ता जानकारी है*


          1979 में मैंने नागौर की किसान छात्रावास में प्रवेश लिया था।तब मुझे पता चला कि, नागौर में निशुल्क सरकारी समाज कल्याण छात्रावास शुरू होने पर अनुसूचित जाति के छात्रों ने तथा अमर छात्रावास शुरू होने पर राजपूतों के छात्रों ने किसान छात्रावास छोड़ा था।


             इसी प्रकार कालान्तर में,मारवाड़ के प्रमुख शहरों में,सभी जाति वर्गों द्वारा अलग-अलग छात्रावास बना लेने से,तात्कालिक सभी किसान छात्रावास केवल जाट छात्रावास होकर रह गए. वैसे आज भी नागौर के किसान छात्रावास में लगभग 15 जातियों के छात्र निवास कर रहे हैं। तथा नागौर की कॉलेज किसान छात्रावास की जमीन पर बनाई गई ग्रामोत्थान विद्यापीठ में सभी जाति वर्गों की बालिकाएं रहती है।


             आजादी से पहले ग्रामीण पिछड़े वर्गों की आर्थिक स्थिति दयनीय थी कि वे बलदेव राम जी की इस मुहिम में आर्थिक सहयोग करने की स्थिति में नहीं थे। मारवाड़ के छात्रों की शिक्षा, एवं शिक्षा के लिए शहरी क्षेत्र में आवास हेतु, मिर्धा जी ने संपन्न वर्गों से आर्थिक सहायता लेकर किसान छात्रावास स्थापित किए थे. 


          हमारी आर्थिक स्थिति इतनी दयनीय थी कि आजादी के बाद भी अनेक बड़े-बड़े  गांवों के लोगों को भी प्राथमिक विद्यालय के लिए एक कमरा खड़ा करने के लिए शहरों के सेठ साहुकारों से मिन्नतें करके चंदा इकट्ठा करना पड़ता था।


सामन्तों,पण्डितों व साहुकारों के शोषण के फलस्वरूप पशुओं से बदतर जीवन जी रहे पिछडो़ं/दलितों में शोषण मुक्ति व

शिक्षा के प्रति जागरूकता के लिए जिन निरंकुश आततायी ताकतों से लोहा लेने की संघर्ष में मिर्धाजी के साथ घटी घटनाओं को सुनकर हृदय में जो रोमांच पैदा होता है।और एक गीत फूट पड़ता है।


कि...

बलदेवो राजकुमार

भौमली जाटां री(कृषकों की).


मारवाड़ की सामंत शाही से उत्पन्न डाकुओं से लोहा लेना तो केवल उनकी आजीविका का हिस्सा था.डाकुओं को मिटाकर आप नौकरी बजाते थे,इसमें शोषकों के धन को सुरक्षित करने के उपरान्त आप शोषितों की शिक्षा व जागरण के लिए जान हथेली पर रखकर पूरे मारवाड़ में ढाणी-ढाणी की यात्राएं करते थे.


संपूर्ण मारवाड़ में मिर्धा जी को आज भी शिक्षा के व्यापक प्रचार-प्रसार तथा रूढ़िवादी मानसिकता के विरुद्ध संघर्ष के लिए याद किया जाता है। इसी स्मृति को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए उनके नाम से नागौर जिला मुख्यालय पर अधि स्नातक महाविद्यालय तथा उनकी पत्नी माडी देवी के नाम से महिला महाविद्यालय का नामकरण किया गया था।

~ महेन्द्र कुड़िया (संपादक- गांव दस्तक)