राजस्थान: नगर निगम चुनाव के बहाने हनुमान बेनीवाल की 2023 की तैयारी!

राजस्थान: नगर निगम चुनाव के बहाने हनुमान बेनीवाल की 2023 की तैयारी!


जयपुर: नागौर से सांसद हनुमान बेनीवाल ने जयपुर, जोधपुर और कोटा के 6 निगमों में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और आरएलपी का गठबंधन था. बेनीवाल गठबंधन उम्मीदवार के रूप में नागौर से जीते थे. अब वो निगम चुनावों में अकेले मैदान में उतर रहे है.


दरअसल, निगम चुनाव भले ही तीन शहरों का हो लेकिन RLP के चुनावी मैदान में उतरने से सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि निगम चुनावों के जरिए बेनीवाल सियासी प्रयोग कर रहे है. जिसमें वो एक तीर से कई निशाने साध रहे है.

कार्यकर्ताओं को सक्रीय करने की कोशिश

2018 विधानसभा चुनावों से ठीक पहले RLP का गठन हुआ था और कार्यकर्ताओं में जोश के दम पर पार्टी 3 सीटें जीतने में कामयाब रही. बाड़मेर और जोधपुर के साथ साथ शेखावाटी की कई सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों ने कड़ी टक्कर दी. लेकिन बीजेपी से गठबंधन के बाद नागौर के बाहर बेनीवाल सीधे तौर पर कार्यकर्ताओं को सक्रीय नहीं रख पा रहे थे. ऐसे में निगम चुनाव अच्छा मौका है.



2023 के लिए विकल्प बनने की कोशिश

बीजेपी के साथ गठबंधन होने के बाद भी हनुमान बेनीवाल लगातार मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) पर निशाना साधते रहे है. लेकिन जिस जनाधार को बेनीवाल ने 2018 चुनाव से पहले तैयार किया था. बीजेपी गठबंधन में रहते हुए उस जनाधार के बंटने का डर भी बेनीवाल को सता रहा है. ऐसे में वो वक्त वक्त पर ये संदेश देते रहते है कि वो बीजेपी गठबंधन से अलग भी हो सकते है.

नागौर में मिर्धा परिवार की कड़ी चुनौती से निपटने के लिए लोकसभा चुनाव में बीजेपी से गठबंधन बेनीवाल की जरूरत भी हो सकती है लेकिन अगले विधानसभा चुनाव में वो अकेले दम पर चुनाव लड़कर पार्टी का विस्तार करने की तैयारी में भी हो सकतेे है. इसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है कि वो निगम चुनावों के जरिए जयपुर, जोधपुर और कोटा जैसे शहरों में पार्टी के लिए जमीन तलाश रहे है.

दबाव की राजनीति !

लोकसभा चुनाव 2019 में जीत के बाद बेनीवाल समर्थक इस उम्मीद में थे कि उन्हें मोदी मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी लेकिन बेनीवाल की जगह बाड़मेर-जैसलमेर सांसद कैलाश चौधरी को पीएम मोदी ने अपनी टीम में शामिल किया. अब एक बार फिर मोदी मंत्रिमंडल में विस्तार की चर्चाएं चल रही है तो बेनीवाल राजस्थान बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश भी कर सकते है.

क्या कामयाब होगी बेनीवाल की रणनीति !

सियासी वजूद को बचाने या उसे मजबूत करने के लिए दो कदम आगे चलना और एक कदम पीछे हटना सबसे सही तरीका माना जाता है. इससे अपनी ताकत का अंदाजा भी लगता है और संभावनाएं तलाशने का मौका भी मिलता है. 2018 में 3 सीटें जीतकर और कई सीटों पर मजबूत रहने के बावजूद 2023 में बेनीवाल के लिए राह इतनी आसान नहीं है

बेनीवाल के लिए राह इतनी आसान नहीं है

बेनीवाल की छवि जाट नेता की है ऐसे में दूसरी जातियों के समर्थन के बिना इससे ज्यादा सीटें जीतना बेहद मुश्किल है.
बेनीवाल के समर्थन में ये तर्क दिया जा सकता है कि नारायण बेनीवाल के अलावा उनकी पार्टी से दोनों विधायक SC-ST समाज के है. लेकिन इंदिरा बावरी और पुखराज गर्ग दोनों अपने विधानसभा क्षेत्र से बाहर जनाधार नहीं बना पाए है. ऐसे में विधायक बनने के बावजूद वो पार्टी के लिए अपने समाज का चेहरा नहीं बन पाए.

ऐसे में बेनीवाल अगर 2023 से पहले बीजेपी से अलग राह पकड़ते है तो उन्हें दूसरे समाज के नेताओं को भी अपने साथ लेना होगा. जिनका अपना जनाधार हो. बेनीवाल के लिए दूसरे नेताओं को साथ लेना और उनके साथ सामंजस्य बिठाना ही सबसे बड़ी कमजोरी है. अगर 2023 से पहले वो बीजेपी से अलग होते है तो क्या 2024 में नागौर लोकसभा सीट अपने दम पर जीत पाएंगे. क्योंकि नागौर में मिर्धा परिवार का अपना मजबूत होल्ड है और अब तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने भरोसेमंद जाट नेता हरीश चौधरी को नागौर का प्रभारी भी इसी रणनीति के साथ बनाया है कि बेनीवाल के मुकाबले कांग्रेस की जमीन को नागौर में मजबूत किया जा सके.